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अब भारत का अपना नेविगेशन सिस्टम आ गया है। | Now India's own navigation system has arrived | DESI GPS


जय हिन्द दोस्तो

आज कल सब लोग gps का use तो करते ही है और आपको पता भी होगा कि gps अमेरिका द्वारा बनाया हुआ है। आप सब जीपीएस का उपयोग रास्ता देखने और किसी भी जगह को देखने के लिए करते होगे। लेकिन अब भारत ने भी अपने खुद का जीपीएस बना लिया है जिसका नाम नाविक है और अब आप लोग अपने मोबाइल में इंडियन जीपीएस को use कर सकते है। हम भारतीयों को अपने देश कि बनती चिगो को use करने में बहुत खुशी मिलती है। और खुद पे गर्व भी होता है और में बता दू कि जो अमरीका का जीपीएस है वो हमारी इंडियन जीपीएस से बहुत निचे है। इंडियन जीपीएस अमरीकी जीपीएस से बहुत एडवांस है तो आज में आपको इस वीडियो में अपने देश के जीपीएस के बारे में सभी बाते बतौगा ।।।।।।।




तो सबसे पेले बात करते है कि भारत को खुद का जीपीएस बनने की जरूरत क्यों पड़ी और कब पड़ी तो बात 1999 की है. जब पाकिस्तानी सेना और आतंकियों ने करगिल में कई जगहों पर अपना कब्जा जमा रखा था. तब भारतीय सेना ने सबसे पहले जीपीएस के द्वारा पूरी स्थिति का जायजा लेने के बारे में सोचा. और उस समय जीपीएस केवल अमरीका के पास था तो भारत ने अमेरिका से मदद मांगी . लेकिन अमेरिका ने इंकार कर दिया.


तभी देश को पहली बार अहसास हुआ कि अपने सेटेलाइट नेविगेशन सिस्टम की कितनी जरूरत है. खैर, अपने जाबांज सैनिकों के दम पर हम करगि‍ल की जंग तो जीत गए. लेकिन एक दूसरी जंग शुरू हुई. जंग अपने लिए जीपीएस जैसी तकनीक विकसित करने की. और देखिए, 28 अप्रैल, 2016 को 12 बजकर 50 मिनट पर श्रीहरिकोटा से IRNSS-1G को सफलतापूर्वक लॉन्च करते ही भारत अब अपने सपने को पूरा कर लिया है और अब हमारे पास अपना gps system है. IRNSS सीरीज में 7 सेटेलाइट छोड़े गए था.

भारत दुनिया का पांचवा ऐसा देश बन गया जिसके पास अपना सेटेलाइट नेविगेशन सिस्टम होगा.


 भारत के अलावा अमेरिका, रूस (GLONASS), चीन (Beidou), जापान (QZSS) के पास ही ये तकनीक उपलब्ध है. इसमें अमेरिका और रूस के नेविगेशन सिस्टम वैश्विक हैं जबकि चीन और जापान जैसे देश क्षेत्रिय स्तर पर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. अपना नेविगेशन सिस्टम शुरू करने की तैयारी यूरोपियन यूनियन ने भी पूरी कर ली है लेकिन फिलहाल वो इस्तेमाल में नहीं है. बहरहाल, आईए आपको बताते हैं कि भारत को IRNSS (इंडिपेंडेंट रिजनल नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम) का फायदा किस तरह और किन क्षेत्रों में है


‌रक्षा के क्षेत्र में बड़ी राहत!


भारत को एक बड़ा फायदा बॉडर की सुरक्षा के क्षेत्र में मिलेगा. खासकर सीमा पार से जिस प्रकार घुसपैठ और भारत विरोधी कार्यों को अंजाम देने की कोशिश की जाती है. उस पर नजर बनाए रखने में अहम मदद मिलेगी. साथ ही समुद्री क्षेत्रों पर भी नजर रखी जा सकेगी.


‌जीपीएस से ज्यादा सटीक जानकारी


IRNSS के जरिए भारत के दूरदराज इलाकों की भी सटीक जानकारी मिल सकेगी. इससे यातायात और दूसरी अन्य चीजों मसलन मैपिंग और रास्तों का सही आकलन करने में मदद मिलेगी.


‌प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में मिलेगी मदद


IRNSS का एक इस्तेमाल प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान का जल्द से जल्द आकलन और सुदूर इलाकों में मदद पहुंचाने के लिए भी किया जा रहा है. इससे पहले ज्यादातर मौकों पर कोई महत्वपूर्ण डाटा हासिल करने के लिए हमें अमेरिका की मेहरबानी पर निर्भर रहना पड़ता था.


‌किसानों और वन विभाग का भी फायदा


दूरदराजों के इलाकों में मिट्टी की गुणवत्ता, मौसम, और कैसी फसल उगाई जाए, इसे लेकर जरूरी सलाह किसानों को दी जा सकेगी. जंगलों में होने वाली दुर्घटनाओं जैसे आग इत्यादि पर नजर रखी जा सकेगी. साथ ही जानवरों की लुप्त होती प्रजातियों को ट्रैक करने और उसमें सुधार लाने में भी मदद मिल सकेगी.

हम फिलहाल IRNSS सीरीज की इन सात सेटेलाइट की तकनीक की मदद से अपने देश सहित इसके चारों ओर करीब 1500 किलोमीटर के आसपास के क्षेत्र में नजर रख सकेंगे. भविष्य में भारत की कोशिश कवरेज एरिया को और बढ़ाने की होगी. पूरी धरती को कवर करने के लिए करीब 25 से 30 सेटेलाइट्स की जरूरत होती है.


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